आगे बढ़ने के लिए पैसा नहीं, दिमाग चाहिए
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आगे बढ़ने के लिए पैसा नहीं, दिमाग चाहिए

तरक्की करने में पीछे रह जाने वाले लोगों से जब भी कारण पूछा जाए तो उनका जवाब होता है कि मेरी तो किस्मत ही खराब है… या फिर – आजकल हर काम के लिए पैसा चाहिए, वो कहां से लाऊं? लेकिन दोस्तो आगे बढ़ने के लिए पैसा नहीं, दिमाग चाहिए, हिम्मत चाहिए। बिना पैसे के भी वो काम किए जा सकते हैं जो किसी ने सोचे तक न हों। यकीन नहीं होता ना? आइए जानते हैं ऐसे ही एक व्यक्ति की सफलता की सच्ची कहानी –

आगे बढ़ने के लिए पैसा नहीं, दिमाग चाहिए – बिना पैसे बन गए गवर्नर

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (केएम मुंशी) का नाम सुना है? ये महान साहित्यकार और राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अच्छे वकील भी थे। ये उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी बने। ये भी कहते थे – आगे बढ़ने के लिए पैसा नहीं, दिमाग चाहिए। इन्होंने ये साबित भी करके दिखाया। आइए जानते हैं इनकी सक्सेस स्टोरी –
केएम मुंशी में पढ़ाई की बहुत ललक थी, लेकिन शुरुआती पढ़ाई के बाद इन्हें कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। जहां इनका घर था, वहां हायर एजुकेशन के लिए कॉलेज नहीं था और बड़े शहर में जाने के लिए पैसा नहीं था। लेकिन जैसे-तैसे हिम्मत की और माता-पिता से 24 रुपये लेकर मुम्बई के लिए निकल पड़े।
वो जमाना सस्ता था। चार रुपये में बॉम्बे तक की रेल टिकट हो गई। छुक-छुक करती ट्रेन से दो दिन में बॉम्बे पहुंच गए। जान ना पहचान, शहर अनजान! पहला सवाल दिमाग में उठा कि रात को रुकने का ठिकाना कहां बनाया जाए? कई जगह धक्के खाए, लेकिन 5 रुपये महीना से कम से कहीं किराए पर रूम नहीं मिल रहा था। मुंशी हैरान परेशान कि यदि इतना किराया दिया तो चार महीने में सारा पैसा किराये में ही खत्म हो जाएगा… फिर खाने-पीने और पढ़ने का खर्च भी तो होना है। लेकिन मुंशी इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं थे। उनके दिमाग में आइडिया आया कि किस तरह इस खर्च को कम किया जाए।
बस वे निकल पड़े अपने आइडिया को अमल में लाने। पूरा दिन धक्के खाने के बाद आखिर उन्होंने ऐसे चार लड़कों को ढूंढ ही लिया जो उनकी तरह महंगा किराया नहीं देना चाहते थे। पांचों ने मिलकर कमरा ले लिया। सबके हिस्से 1-1 रुपया किराया आया। जितना पैसा एक महीने के किराये में देना पड़ता, अब उतने में वे पांच-पांच महीने रह सकते थे।
अब बारी आई खाने की। ढाबों पर पता किया तो 4-5 रुपये महीने से कम में कोई तैयार नहीं हो रहा था। यहां भी को-ऑपरेटिव सिस्टम अपनाने का आइडिया काम कर गया। सबका खाना एक साथ पकाने के लिए एक ढाबे वाले से बात कर ली। यहां भी 1 रुपये महीने में काम चलने लगा।
हायर एजुकेशन के लिए एडमिशन लिया तो किताबों की समस्या आई। यहां भी को-ऑपरेटिव सिस्टम पर चलने वाली एक लाइब्रेरी ढूंढ ली। थोड़ा पैदल चलना पड़ता, लेकिन इससे सस्ता तरीका था नहीं। ऐसे ही काम चलाते-चलाते उन्होंने वकालत की पढ़ाई कर डाली और एडवोकेट बन गए।
धीरे-धीरे फेमस भी हो गए तो देश को आजाद कराने की जंग में साथ देते हुए राजनीति में भी हाथ आजमाने लगे। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा पद – गवर्नर पद सौंप दिया गया।
एक जगह अपने भाषण में उन्होंने खुद यह पूरा किस्सा सुनाया था। तब उन्होंने कहा था कि आगे बढ़ने के लिए पैसा नहीं, दिमाग चाहिए और हिम्मत चाहिए। तो दोस्तो, सही बात है कि नहीं। बिना पैसे के जो आदमी स्ट्रगल कर गवर्नर तक बन सकता है तो भला और ऐसा कौन-सा काम होगा जो नहीं किया जा सकता। बस दिमाग लगाइए और हिम्मत बनाए रखिए…।
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